NCERT Padpo me Poshan Class 7 Notes in Hindi : यह नोट्स Class 7 Science NCERT New Book के लेटेस्ट पैटर्न के आधार पर तैयार किया गया है, जिसे हमारे Expert के द्वारा तैयार किया गया है। यह नोट्स Latest 2027 के पैटर्न पर आधारित है।

Chapter 2 प्राणियों में पोषण
पोषण—सजीवों द्वारा भोजन ग्रहण करने एवं इसके उपयोग की विधि को पोषण कहते हैं।
आहार नाल- जंतुओं में भोजन ग्रहण करने के लिए एवं उसको पचाने के लिए एक विशेष अंग होता है, जिसे आहार नाल कहते हैं। इसकी लंबाई 8 से 10 मीटर होती है।
- आहारनाल मुखगुहा से शुरू होकर गुदा या मलद्वार तक जाती है।
- वैसे अंग जो भोजन पचाने में सहायता करते हैं। उन्हें सामुहिक रूप से पाचन तंत्र कहते हैं।
आहारनाल के विभिन्न भाग—
- मुख गुहिका
- ग्रसिका या ग्रास नली
- आमाश्य
- क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)
- बृहदांत्र (बड़ी आँत)
- मलाशय
- गुदा या मलद्वार
मुख एवं मुख-गुहिका
- मुखगुहा आहारनाल का पहला भाग है। पाचन मुखगुहा से प्रारंभ होता है।
- आहार के शरीर के अंदर लेने की क्रिया अंतर्ग्रहण कहलाती है।
- मुखगुहा एक खाली जगह होता है जिसमें एक जीभ, तीन जोड़ा लार ग्रंथि तथा 32 दांत पाये जाते हैं।
- मुखगुहा को बंद करने के लिए दो मुलायम होंठ होते हैं।
- मनुष्य के मुखगुहा में तीन जोड़ी लार ग्रंथियाँ पाई जाती है, जिससे प्रतिदिन डेढ़ लीटर लार निकलता है।
- लार में एमाइलेज एंजाइम होता है।
मुखगुहा में लार का कार्य-
- यह मुखगुहा को साफ रखती है।
- भोजन को चिपचिपा और लसलसा बना देता है।
- यह भोजन में उपस्थित किटाणुओं को मार देता है।
- लाला रस चावल के मंड को शर्करा में बदल देता है।
दाँत
- दाँत में सर्वाधिक मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है।
- हमारे जीवनकाल में दाँतों के दो सेट विकसित होते हैं।
- प्रथम सेट बचपन में ही निकलकर लगभग 8 साल की आयु तक गिर जाते हैं। प्रथम सेट के दाँत को दूध के दाँत कहते है।
- दूध के दाँत गिरने के बाद स्थायी दाँत निकलते हैं, जो जीवनभर रहते हैं।
- एक व्यस्क मनुष्य के शरीर में 32 दाँत होते हैं। दुध के दाँतों की संख्या 20 होती है।
मानव दाँत चार प्रकार के होते हैं-
- इनसाइजर (कृंतक) (8)— काटने का कार्य
- केनाइन (रदनक) (4)— फाड़ने का कार्य
- प्रीमोलर (अग्रचर्वणक) (8)— पीसने और चबाने का काम
- मोलर (चर्वणक) (12)— पीसने और चबाने का काम
मानव दाँत के दो परत होता है। बाहरी परत इनामेल कहलाता है जबकि आंतरिक परत डेंटाइन कहलाता है।
मानव शरीर का सबसे कठोर भाग दाँत का इनामेल होता है। इनामेल दाँतों की रक्षा करता है।
दाँतों की सुरक्षा
- जब हम मिठी चीज खाकर दाँत साफ नहीं करते हैं, तो मुख में अनके हानिकारक जीवाणु वास करके वृद्धि करने लगते हैं। यह जीवाणु दाँतों में फँसे शर्करा का विघटन करके अम्ल में परिवर्तित कर देते हैं। यह अम्ल दाँत को धीरे-धीरे क्षति पहुँचाते हैं। जिसे दंत क्षय कहते हैं।
- दंत क्षय से दाँतों में असहनीय दर्द होने लगता है तथा वह सड़कर टूटने लगते हैं।
- सुबह और रात में सोने से पहले दातुन या ब्रश से जरूर साफ करना चाहिए।
- कुछ भी खाने के बाद अच्छी तरह से कुल्ली करना चाहिए।
- अधिक चॉकलेट, मीठी चीजें, ठण्डे पेय आदि नहीं खाना चाहिए। इससे दाँत खराब होते हैं।
भोजन नली (ग्रसिका)
- यह मुखगुहा को अमाशय से जोड़ने का कार्य करता है। यह नली के समान होता है। भोजन नली से भोजन अमाशय में पहुँचता है।
- ग्रसिका की भित्ति के संकुचन से भोजन नीचे की ओर सरकता है।
आमाशय
- यह आहारनाल का सबसे चौड़ा भाग है। इसकी दीवार मोटी होती है। यह J आकार की होती है।
- अमाशय से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का स्त्राव होता है, जो कीटाणुओं को मार देता है और भोजन को अम्लीय बना देता है।
- अमाशय के आंतरिक दिवार से श्लेष्मल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल तथा पाचक रस निकलता है।
- श्लेष्मल आमाश्य के आंतरिक दिवार को सुरक्षा प्रदान करता है।
- अम्ल भोजन में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं को मारता है।
- पाचक रस (जठर रस) जो भोजन को पचाने का कार्य करता है। यह प्रोटीन को सरल पदार्थों में तोड़ देता है।
छोटी आँत (क्षुद्रांत्र)
- यह लगभग 7.5 मीटर लंबी अत्यधिक कुंडलित नली है।
- छोटी आँत आहारनाल का सबसे लंबा भाग है।
- छोटी आँत में ही पाचन की क्रिया पूर्ण होती है।
- पचे हुए भोजन का अवशोषण छोटी आँत में ही होता है।
- वसा का पूरी तरह से पाचन छोटी आँत में होता है।
- छोटी आँत की आंतरिक दीवार पर अँगुली के समान उभरी हुई संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें दीर्घरोम अथवा रसांकुर कहते हैं।
- पचे हुए भोजन का अवशोषण इसी रसांकुर से होती है।
- अवशोषित पदार्थों को रूधिर वाहिकाओं (रक्त) के माध्यम से शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाया जाता है, जिसे स्वांगीकरण कहते हैं।
- भोजन का वह भाग जिसका पाचन या अवशोषण नहीं हो पाता है, उसे बृहदांत्र में भेज दिया जाता है।
यकृत- यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है। यह गहरे लाल-भूरे रंग की ग्रंथि है, जो उद के ऊपरी भाग में दाहिनी ओर अवस्थित होती है।
यकृत से पित्त का स्त्राव होता है। जो पित्ताशय में जमा होता है।
अग्न्याशय हल्के पीले रंग की बड़ी ग्रंथि है, जो आमाशय के ठीक नीचे स्थित होती है। इससे निकलने वाला एंजाइम भोजन को पचाने में सहायता करता है।
बड़ी आँत
- इसकी लंबाई 1.5 मीटर होती है।
- बड़ी आँत में जल तथा कुछ लवणों का अवशोषण होता है। बाकी बचा हुआ पदार्थ मलाशय में चला जाता है। जहाँ से समय-समय पर गुदा द्वारा मल के रूप में बाहर निकाल दिया जाता है।
- मल का गुदा के माध्यम से बाहर निकलना निष्कासन कहते हैं।
घास खाने वाले जंतुओं में पाचन
- जुगाली करने वाले जन्तु तेजी से भोजन निगलकर अमाशय का एक भाग रूमेन (प्रथम आमाशय) में जमा करते हैं। जिसे बाद में जुगाली या पागुर करते हैं।
- बाद में जंतु रूमेन में जमा भोजन को चबाता है। इस प्रक्रम को रामन्थन (जुगाली करना) कहते हैं।
- ऐसे जुत जो जगाली करते हैं, उसे रूमिनैन्ट अथवा रोमन्थी कहलाते हैं।
- घास में सेलुलोस की अधिकता होती है। जुगाली करने वाले जानवरों के रूमेन में सेलुलोस का पाचन करने वाले जीवाणु पाए जाते हैं।
- मानव एवं बहुत से जंतुओं के आहारनाल में सेलुलोस का पाचन नहीं हो सकता है क्योंकि इनके आहारनाल में सेलुलोस के पाचन करने वाले जीवाणु नहीं होते हैं।
मानव में पोषण के विभिन्न चरण
अंतर्ग्रहण : आहार को प्राप्त और ग्रहण करना । मनुष्य में यह मुख द्वारा होता है जहाँ दाँत से भोजन को चबाया जाता है ।
पाचन : भोजन के जटिल अवयवों से उपयोगी पदार्थो का संश्लेषण । पाचन की प्रक्रिया में मुख से आरंभ होकर आँत तक पूरी हो जाती है जिसमें अनेक रासायनिक स्राव (एन्जाइम) मदद करते हैं ।
अवशोषण : पचित भोजन का रसांगुलों द्वारा ग्रहण एवं रक्त में मिलने की प्रक्रिया |
स्वांगीकरण : शरीर के वृद्धि और विकास के लिए पचित भोजन का उपयोग । निष्क्रमण अपचित भोजन का आहार नाल से निष्कासन ।
अमीबा में पोषण
- अमीबा भोजन को कुटपाद की सहायता से ग्रहण करते हैं।
- अमीबा मृदुजल में पाया जाता है। यह एककोशिकीय जीव होता है। जिसका आकार अनिश्चित होता है।
- अमीबा का भोजन शैवाल के छोटे-छोटे टुकड़े, बैक्टीरिया, डायटम, अन्य छोटे एककोशिकीय जीव तथा मृत कार्बनिक पदार्थ के छोटे-छोटे टुकड़े इत्यादि हैं।
- अमीबा में भोजन का पाचन खाद्यधानी (रसधानी) में होता है।
- खाद्य धानी में पाचक रस स्त्रावित होता है, जो खाद्य पदार्थ पर क्रिया करके उन्हें सरल पदार्थों में बदल देते हैं।
- पचा हुआ खाद्य धीरे-धीरे अवशोषित हो जाता है।
- अवशोषित पदार्थ अमीबा की वृद्धि, रख-रखाव एवं गुणन के लिए उपयोग किया जाता है।
- बिना पचा अपशिष्ट खाद्यधानी से बाहर निकाल दिया जाता है।
- भोजन के पाचन का आधारभूत प्रकम सभी जीवों में समान है, जिसमें खाद्य पदार्थ सरल पदार्थ में परिवर्तित किए जाते हैं एवं ऊर्जा मुक्त होती है।