Padap me Janan Class 7 Science Notes – पादप में जनन

NCERT Padap me Janan Class 7 Science Notes in Hindi : यह नोट्स Class 7 Science NCERT New Book के लेटेस्‍ट पैटर्न के आधार पर तैयार किया गया है, जिसे हमारे Expert के द्वारा तैयार किया गया है। यह नोट्स Latest 2027 के पैटर्न पर आधारित है।

Padap me Janan class 7 notes

Chapter 8 पादप में जनन

जनन— जीवों द्वारा अपने जैसा संतान उत्‍पन्‍न करना जनन कहलाता है।

कायिक जनन— जब पौधों में जड़, तना तथा पत्तियाँ नए पौधे का निर्माण करती है, तो उसे कायिक जनन कहते हैं।

जनन के प्रकार- पौधों में जनन दो प्रकार से होता है—

  1. लैंगिक जनन
  2. अलैंगिक जनन

अलैंगिक जनन

जनन की वह प्रकार जिसमें सिर्फ एक व्‍यष्टि भाग लेता है, उसे अलैंगिक जनन कहते हैं।

कायिक जनन भी एक प्रकार का अलैंगिक जनन है। कायिक जनन में जड़, तना, पत्तियाँ, कली पौधों से अलग होकर नए पौधे का निर्माण करते हैं।

सहजन (मुनगा), हल्‍दी, अदरख, गन्‍ना आदि में कायिक जनन होता है।

लेयरिंग विधि

कुछ पौधों जैसे बेली, चमेली, गेंदा आदि में नए पौधों के लिए लेयरिंग विधि का उपयोग किया जाता है।

इसमें पौधे के किसी शाखा को नमी युक्‍त मिट्टी में 15-20 दिनों तक दबा दिया जाता है। मिट्टी में दबे भाग पर जड़ें निकलने लगती है। मिट्टी सहित मुख्‍य तने को काटकर जहाँ आवश्‍यकता होती है, वहाँ लगा दिया जाता है।

मुकुलन

मुकुलन एक प्रकार का अलैंगिक जनन है जो जनक के शरीर से कलिका फुटने या प्रवर्ध निकलने के फलस्वरूप संपन्न होता है। जैसे- यीस्ट

खंडन

खंडन के द्वारा ही मुख्य रूप से एक कोशिकीय जीव जनन करते हैं। इसमें जीव दो या दो से अधिक भागों में खंडित हो जाते हैं और कुछ ही दिन में नए टुकड़े जनकों के समान हो जाते हैं। जैसे- जीवाणु, अमीबा, पैरामीशियम, एक कोशिकीय शैवाल आदि

बीजाणु निर्माण- इस प्रकार के जनन में बीजाणु हवा में तैरते रहते हैं और हल्‍का होने के कारण दूर-दूर तक जाते हैं। अनुकूल परिस्थिति में बीजाणु अंकुरित होकर नए जीवों के रूप में विकसित हो जाते हैं। कवक, मॉस तथा फर्न में बिजाणु निर्माण द्वारा जनन होता है।

लैंगिक जनन

  • जनन की वह विधि जिसमें नर और मादा भाग लेते हैं, उसे लैंगिक जनन कहते हैं।
  • पुष्‍प में पुंकेसर नर जनन अंग और स्‍त्रीकेसर मादा जनन अंग होता है।
  • ऐसे पुष्प, जिनमें या तो केवल पुंकेसर अथवा केवल स्त्राकेसर उपस्थित होते हैं, एकलिंगी पुष्प कहलाते हैं।
  • जिन पुष्पों में पुंकेसर और स्त्राकेसर दोनों ही होते हैं, वे द्विलिंगी पुष्प कहलाते हैं।
  • मक्का, पपीता और ककड़ी या खीरे के पौधों में एकलिंगी पुष्प होते हैं, जबकि सरसों, गुलाब और पिटूनिया के पौधा में द्विलिंगी पुष्प होते हैं।
  • नर और मादा एकलिंगी पुष्प दोनों एक ही पादप पर उपस्थित हो सकते हैं अथवा भिन्न पादपों पर पाए जा सकते हैं।

पुष्पी पौधों में लैंगिक जनन

  • लैंगिक जनन के लिए पुष्पी पौधों में फूल ही वास्तविक जनन भाग है। पौधों के पुष्पों में ही जनन अंग उपस्थित होते हैं।
  • फूल जिस तने से जुड़ा रहता है, वह वृंत कहलाता है। वृंत का ऊपरी फैला हुआ भाग पुष्पासन कहलाता है, जिस पर संपूर्ण पुष्प टिका रहता है।

पुष्प के चार भाग होते हैं-

बाह्य दल पुंज, 2. दलपुंज, 3. पुमंग और 4. जायांग

  1. बाह्य दल पुंज- पुष्प का सबसे बाहरी भाग होता है। इसका रंग हरा होता है।
  2. दलपुंज- बाह्य दल पुंज का ऊपरी भाग होता है। यह रंगीन होता है।
  3. पुमंग- यह पुष्प का नर भाग है। इनमें लंबी-लंबी रचनाएँ पाई जाती है, जिसे पुंकेसर कहते हैं।
  4. जायांग- यह पौधों का मादा भाग है। जिसे स्‍त्रीकेसर कहते हैं। स्त्रीकेसर बीजाण्‍ड, अंडाशय, वर्तिका और वर्तिकाग्र में बँटे होते हैं।

स्त्रीकेसर के अण्‍डाशय में एक या अधिक बीजाण्‍ड होते हैं जो मादा युग्‍मक बनाते हैं।

पुंकेसर के दो भाग होत हैं-

  1. तंतु- यह लचीला, पतला, लंबा तथा डोरे के समान होता है और पुष्पासन से जुड़ा होता है।
  2. परागकोश- तंतु के ऊपरी भाग परागकोश कहलाता है। इसके अंदर परागकण होते हैं, जो निषेचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह नर युग्‍मक बनाता है।

नर युग्मक (परागकरण) और मादा युग्मक (बीजाण्‍ड) मिलकर जिस सरंचना का निर्माण करते हैं, उसे युग्‍मनज (zygote) कहते हैं।

परागण— परागकोश के परागकरण का निकलकर पुष्‍प के वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागण कहलाता है।

जब परागकण अपने ही फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचता है, तो उसे स्‍वयं परागण कहते हैं।

जब परागकण अपने ही पौधों के दूसरे फूलों के वर्तिकाग्र तक हो या अपने ही जाति के दूसरे पौधों के फूलों के वर्तिकाग्र तक हो तो इसे पर परागण कहते हैं।

निषेचन- नर युग्मक (परागकरण) और मादा युग्मक (बीजाण्‍ड) के मिलने की क्रिया को निषेचन कहा जाता हैं।

नर तथा मादा युग्‍मकों के संयोग से बनी कोशिका युग्‍मनज कहलाती है।

वर्तिकाग्र चिपचिपा होने के कारण परागकण चिपक जाता है और परागनलिका का निर्माण करता है जो स्‍त्रीकेसर से बीजाण्‍ड तक जाता है। बीजाण्‍ड से परागकरण मिलता है तो निषेचन सम्‍पन्‍न होता है। जिसके फलस्‍वरूप युग्‍मनज का निर्माण होता है।

फल और बीज का विकास

युग्‍मनज भ्रूण में विकसित होने लगता है। भ्रूण बीज बनता है। अण्‍डाशय का आकार बढ़कर फल के रूप में विकसित हो जाता है। जबकि पुष्प के अन्य भाग मुरझाकर गिर जाते हैं। परिपक्व हो जाने पर अंडाशय फल के रूप में विकसित हो जाता है। बीजांड से बीज विकसित होते हैं। बीज में एक भ्रूण होता है, जो सुरक्षात्मक बीजावरण के अंदर रहता है।

बीजों का प्र‍कीर्णन- बीजों का एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान तक जल, वायु तथा जन्‍तुओं द्वारा जाना बीजों का प्रकीर्णन कहलाता है।

  • सूर्यमुखी तथा घास का बीज हवा में उड़कर एक जगह से दूसरे जगह पहुँचते हैं।
  • नारियल का अवारण जल की धारा के साथ एक जगह से दूसरी जगह जाकर उगते हैं।
  • पीपल, बरगद जैसे वृक्षों के बीज चिड़ियों के माध्‍यम से दूर-दूर तक पहुँचते हैं।

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