NCERT Jantu aur Padap me Parivahan Class 7 Notes in Hindi : यह नोट्स Class 7 Science NCERT New Book के लेटेस्ट पैटर्न के आधार पर तैयार किया गया है, जिसे हमारे Expert के द्वारा तैयार किया गया है। यह नोट्स Latest 2027 के पैटर्न पर आधारित है।

Chapter 7 जन्तुओं और पादप में परिवहन
हृदय और रक्त वाहिनियाँ को संयुक्त रूप से परिसंचरण तंत्र कहते हैं।
परिसंचरण तंत्र
रक्त (Blood)
रक्त वह तरल पदार्थ या द्रव है, जो रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होता है। यह पाचित भोजन को क्षुद्रांत (छोटी आँत) से शरीर के अन्य भागों तक ले जाता है।
यह पाचित भोजन को क्षुद्रांत (छोटी आँत) से शरीर के अन्य भागों तक ले जाता है। फेफड़ों से ऑक्सीजन को भी रक्त ही शरीर की कोशिकाओं तक ले जाता है। रक्त शरीर में से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के लिए उनका परिवहन भी करता है।
रक्त के दो भाग होते हैं :
द्रव भाग- रक्त के द्रव भाग को प्लाज्मा कहते हैं।
ठोस भाग- रक्त के ठोस भाग को रूधिराणु कहते हैं।
लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC)- यह ऑक्सीजन को शरीर के विभिन्न कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड को फेफड़ों तक पहुँचाने का कार्य करता है। इसकी कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन पाया जाता है।
रक्त का रंग लाल क्यों?
- लाल रक्त कोशिकाओं में एक विशेष प्रकार का प्राटीन वर्णक हीमोग्लोबिन पाया जाता है। हीमोग्लोबिन के कारण ही रक्त का रंग लाल दिखता है।
- हीमोग्लोबिन की कमी होने पर शरीर की सभी कोशिकाओं को कुशलतापूर्वक ऑक्सीजन प्रदान करना कठिन हो जाता है।
श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC)- ये कोशिकाएँ उन रोगाणुओं को नष्ट करती हैं, जो हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।
रक्त पट्टिकाणु (Platelates)- यह रक्त को थक्का बनाने में मदद करते है।
रक्त के कार्य— रक्त परिवहन का कार्य करता है।
- फेफड़ा से ऑक्सीजन लेकर हर कोशिकाओं तक पहुँचाना और हर कोशिकाओं से कार्बन डाइऑक्साइड को फेफड़ों तक पहुँचाना।
- मांसपेशियों में बने अपशिष्ट पदार्थ को शरीर के उत्सर्जन अंग तक पहुँचाना
- खाद्य पदार्थों को शरीर के विभिन्न कोशिकाओं तक पहुँचाना।
रक्त वाहिनियाँ
जो रक्त को शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का कार्य करते हैं, उसे रक्त वाहिनियां (नाड़ी) कहते हैं।
हमारे शरीर में दो प्रकार की रक्त वाहिनियाँ होती है :
धमनी
शिरा
- ध्मनियाँ हृदय से ऑक्सीजन समृद्ध रक्त को शरीर के सभी भागों में ले जाती हैं। चूँकि रक्त प्रवाह तेज़ी से और अधिक दाब पर होता है, अतः धमनियों की भित्तियाँ (दीवार) मोटी और प्रत्यास्थ होती हैं।
- प्रति मिनट स्पंदों की संख्या स्पंदन दर कहलाती है। विश्राम की अवस्था में किसी स्वस्थ वयस्क व्यक्ति की स्पंदन दर सामान्यतः 72 से 80 स्पंदन प्रति मिनट होती है।
- वे रक्त वाहिनियाँ, जो कार्बन डाइऑक्साइड समृध्द रक्त को शरीर के सभी भागों से वापस हृदय में ले जाती हैं, शिराएँ कहलाती हैं। शिराओं की भित्तियाँ अपेक्षाकृत पतली होती हैं। शिराओं में ऐसे वाल्व होते हैं, जो रक्त को केवल हृदय की ओर ही प्रवाहित होने देते हैं।
- ध्मनियाँ छोटी-छोटी वाहिनियों में विभाजित हो जाती है। ऊतकों में पहुँचकर वे पुनः अत्यधिक पतली नलिकाओं में विभाजित हो जाती है, जिन्हें केशिकाएँ कहते हैं। केशिकाएँ पुनः मिलकर शिराओं को बनाती हैं, जो रक्त को हृदय में ले जाती हैं।
धमनी और सिरा में अंतर
- धमनियाँ हृदय से ऑक्सीजन वाला रक्त को शरीर के सभी भागों में ले जाती है। जबकि सिराएँ शरीर के सभी भागों से कार्बन डाइऑक्साइड वाला रक्त हृदय तक ले जाती है।
- धमनी में रक्त प्रवाह तेजी से और अधिक दाब से होता है। जबकि सिरा में रक्त प्रवाह धीमी गति से और कम दाब से होता है।
- धमनी की दीवार मोटी और लचीली होती है जबकि सिरा का दिवार पतली और कपाटयुक्त होती है।
हृदय
- हृदय एक प्रकार का पंपिंग अंग है जो रक्त के साथ पदार्थों के परिवहन के लिए पंप के रूप में कार्य करता है।
- हृदय प्रतिदिन लगभग एक लाख बार धड़कता है।
- हृदय वक्ष गुहा में स्थित होता है।
- हृदय चार कक्षों में बँटा होता है। ऊपरी दो कक्ष आलिन्द कहलाता है और निचले दो कक्ष निलय कहलाता है।
- बायां आलिन्द, दायां आलिन्द, बायां निलय और दायां निलय।
हृदय स्पंद
- लयबद्ध हृदय को सिकुड़ने और फैलने की क्रिया मिलकर हृदय स्पंदन कहलाता है।
- हृदय की धड़कन सुनने वाले मशीन को स्टेथोस्कोप कहते हैं।
- रक्त परिसंचरण की खोज विलियम हार्वे ने किया।
- स्पंज और हाइड्रा में रक्त परिसंचरण तंत्र नहीं पाया जाता है।
जंतुओं में उत्सर्जन
उत्सर्जन— हमारे शरीर से अनुपयोगी पदार्थों को बाहर निकलना उत्सर्जन कहलाता है। जैसे यूरिया का मूत्र के माध्यम से बाहर निकलना।
अथवा
सजीवों द्वारा कोशिकाओं में बनने वाले अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकलने की प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।
रक्त से नाइट्रोजन युक्त विशैले पदार्थों को विभिन्न अंगों द्वारा बाहर निकलता है। इन अंगों के समुह को उत्सर्जन तंत्र कहते हैं।
मावन उत्सर्जन तंत्र
- उत्सर्जन तंत्र के अंतर्गत गुर्दा, मूत्राशय, मूत्र नली आदि उत्सर्जन अंग आते हैं।
- हमारे शरीर में दो गुर्दा या वृक्क (Kidney) होता है। जो रक्त से हानिकारक पदार्थों (जैसे यूरिया) को छानने का कार्य करता है। हानिकारक पदार्थों को रक्त से छानकर मूत्राशय में जमा करता है।
- मूत्र में 95 प्रतिशत जल, 2.5 प्रतिशत यूरिया और 2.5 प्रतिशत अन्य अपशिष्ट पदार्थ होते हैं।
- हमारे दोनों किडनी प्रतिदिन लगभग 1100 से 2000 लीटर रक्त को छानने का कार्य करता है।
- रक्त प्रत्येक 4 मीनट में एक बाद गुर्दे में शुद्ध होने के लिए जाता है अर्थात लगभग 5.5 लीटर रक्त गुर्दे में शुद्ध होने में 4 मीनट का समय लगता है।
- त्वचा के निचली परत में स्वेद ग्रंथियाँ होती है जिससे हमें पसीना आता है। स्वेद में जल और लवण होता है।
- पसीना के कारण हमारे शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है।
- गर्मियों में पसीना में उपस्थित लवण के कारण रंगीन कपड़ों पर सफेद धब्बे दिखाई देते हैं।
डायलिसिस/अपोहन
- किसी व्यक्ति के वृक्क काम न करने की स्थिति में डायलिसिस मशीन द्वारा रक्त को शुद्ध करने की विधि को अपोहन कहते हैं।
- अपोहन की क्रिया डायलिसिस मशीन द्वारा किया जाता है जो रक्त से अपशिष्ट पदार्थों को छानने का कार्य करता है।
- डायलिसिस मशीन कृत्रिम वुक्क का कार्य करता है।
- कभी-कभी हमारे शरीर के हाथ और पैर सुन्न और उसमें झिनझिनी उत्पन्न होने का कारण ऑक्सीजन और पोषणयुक्त रक्त का नहीं मिलना या कम मिलना।
पादपों में पदार्थों का परिवहन
- पौधों में परिवहन मुख्य रूप से जाइलम और फ्लोएम कोशिकाओं के द्वारा होता है।
- पौधें की जड़ों द्वारा अवशोषित जल तथा पोषक तत्त्व पत्तियों तक कोशिकाओं द्वारा पहुँचाए जाते हैं।
- जल और खनिजों का परिवहन
- पादप जड़ों के मूलरोम द्वारा जल और खनिजों अवशोशण होता है।
- पादपों में मृदा से जल और पोषक तत्त्वों के परिवहन के लिए पाइप जैसी वाहिकाएँ होती हैं। वाहिकाएँ विशेष कोशिकाओं की बनी होती हैं, जो संवहन ऊतक बनाती हैं।
- जल और पोषक तत्त्वों के परिवहन के लिए पादपों में जो संवहन ऊतक होता है, उसे जाइलम दारू कहते हैं।
- पत्तियों द्वारा संश्लेशित भोजन के परिवहन के लिए पादपों में जो संवहन ऊतक होता है, उसे फ्लोएम कहते हैं।
वाष्पोत्सर्जन- पौधों के वायवीय भागों से जल का रंध्रों द्वारा वाष्प के रूप में निष्कासन की क्रिया वाष्पोत्सर्जन कहलाती है।
- पौधों के पित्तयों में सुक्ष्म छिद्र पाई जाती है, जिसे रंध्र कहते हैं। रंध्रों के माध्यम से श्वसन तथा वाष्पोत्सर्जन की क्रिया होती है।
- वाष्पोत्सर्जन के कारण जल का संचलन जाइलम ऊतकों से रंध्रों के तक हमेशा होता रहता है।
- पौधों की जड़ से चोटी तक जल का प्रवाह वाष्पोत्सर्जन के कारण होती है।
- वाष्पोत्सर्जन के कारण पौधों का तापमान स्थिर रहता है।
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