Jivo me Swasan Class 7 Notes – जीवों में श्‍वसन

NCERT Jivo me Swasan Class 7 Notes in Hindi : यह नोट्स Class 7 Science NCERT New Book के लेटेस्‍ट पैटर्न के आधार पर तैयार किया गया है, जिसे हमारे Expert के द्वारा तैयार किया गया है। यह नोट्स Latest 2027 के पैटर्न पर आधारित है।

Jivo me Swasan Class 7 Notes

Chapter 6 जीवों में श्‍वसन

  • वे सभी क्रियाएँ जिससे हमें ऊर्जा प्राप्‍त होती है, उसे श्‍वसन कहते हैं।
                                        अथवा,
    शरीर की कोशिकाओं में ऑक्‍सीजन की अनुपस्थिति में ग्‍लूकोज अणुओं का रासायनिक अपघटन श्‍वसन कहलाता है।
  • कोशिका में भोजन के विखंडन के प्रक्रम में ऊर्जा मुक्‍त होती है। जिसे कोशिकीय श्‍वसन कहते हैं।
  • ग्‍लुकोज अणुओं के अपघटन के फलस्‍वरूप CO2 और जल प्राप्‍त होता है तथा ऊर्जा मुक्‍त होती है।

वायवीय श्‍वसन- ऑक्‍सीजन की उपस्थिति में होने वाले श्‍वसन को वायवीय श्‍वसन कहते हैं।

  • वायवीय श्‍वसन में ऑक्‍सीजन की उपस्थिति में ग्‍लुकोज का अपघटन होता है।

अवायवीय श्‍वसन- ऑक्‍सीजन की अनुपस्थिति में होने वाले श्‍वसन को अवायवीय श्‍वसन कहते हैं।

  • अवायवीय श्‍सवन में ऑक्‍सीजन की अनुपस्थिति में ग्‍लुकोज का अपघटन होता है। इस क्रिया के फलस्‍वरूप अल्‍कोहल, कार्बन डाइऑक्‍साइड तथा ऊर्जा प्राप्‍त होता है।
  • अवायवीय श्‍वसन में ऑक्‍सीजन की अनुपस्थिति में भोजन विखंडित होता है।
  • भोजन के विखंडन से ऊर्जा प्राप्‍त होती है।
  • ऑक्‍सीजन की अनुपस्थिति में ग्‍लूकोज का अल्‍कोहल में अपघटन होने की क्रिया किण्‍वन कहलाता है।
  • यीस्‍ट जैसे जीव वायु के अनुपस्थिति में जीवित रह सकते हैं।
  • ऐसे जीव जो अवायवीय श्‍वसन के द्वारा ऊर्जा प्राप्‍त करते हैं। उन्‍हें अवायवीय जीव कहते हैं।
  • अवायवीय श्‍वसन एंटअमीबा, यीस्‍ट तथा जीवाणुओं में होता है।
  • यीस्‍ट एक को‍शिकीय सूक्ष्‍मजीव है जिसमें अवायवीय श्‍सवन होता है और इथाइल अल्‍कोहल बनता है।
  • यीस्‍ट का प्रयोग अंग्रजी शराब, पावरोटी एवं बिस्‍कुट उद्योग में होता है।

अत्यध्कि व्यायाम करने के बाद आपकी पेशियों में ऐंठन क्यों होती है?

उत्तर- ऐंठन तब होती है, जब पेशियाँ अवायवीय रूप से श्वसन करती हैं। इस प्रक्रम में ग्लूकोस के आंशिक विखंडन से लैक्टिक अम्ल और कार्बन डाइऑक्साइड बनते हैं। लैक्टिक अम्ल का संचयन पेशियों में ऐंठन उत्पन्न करता है। गर्म पानी से स्नान करने अथवा शरीर की मालिश करवाने पर हमें ऐंठन से आराम मिलता है।

गर्म जल से स्‍नान अथवा शरीर में मालिश करने से पेशियों का दर्द आराम क्यों हो जाता है?

गर्म जल से स्नान अथवा शरीर की मालिश करने से रक्त का संचरण बढ़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप पेशी कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ जाती है। ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ जाने से लैक्टिक अम्ल का कार्बन डाइऑक्साइड और जल में पूर्ण विखंडन हो जाता है।

श्‍वसन

  • ऑक्‍सीजन युक्‍त हवा शरीर के अन्‍दर ले जाने की क्रिया को अन्‍त:श्‍वसन कहते हैं।
  • कार्बन डाइऑक्‍साइड युक्‍त हवा को शरीर से बाहर निकालने की क्रिया को उच्‍छवसन कहते हैं।
  • कोई व्‍यक्ति एक मिनट में जितनी बार श्‍वसन करता है, वह उसकी श्‍वसन दर कहलाती है।
  • अंतःश्वसन और उच्छ्वसन दोनों साथ-साथ होते रहते हैं। एक श्वास अथवा साँस का अर्थ है, एक अंतःश्वसन और एक उच्छ्वसन।
  • कोई वयस्क व्यक्ति विश्राम की अवस्था में एक मिनट में औसतन 15-18 बार साँस अंदर लेता और बाहर निकालता है। अध्कि व्यायाम करने में श्वसन दर 25 बार प्रति मिनट तक बढ़ सकती है।

हम श्‍वास कैसे लेते हैं?

मानव में श्‍वसन क्रिया में भाग लेने वाले मुख्‍य अंग निम्‍नलिखित है :

  • नासाद्वार, नासागुहा, श्‍वासनली, फेफड़ा, आदि।
  • सामान्यतः हम अपने नासा-द्वार से वायु अंदर लेते हैं। जब हम वायु को अंतःश्वसन द्वारा अंदर लेते हैं, तो यह हमारे नासा-द्वार से नासा-गुहा में चली जाती है। नासा-गुहा से वायु, श्वास नली से होकर हमारे फेफड़ों फुफ्फुस में जाती है।
  • अंतःश्वसन के समय पसलियाँ ऊपर और बाहर की ओर गति करती हैं और डायाप्रफाम नीचे की ओर गति करता है। जिससे हमारे वक्ष-गुहा का आयतन बढ़ जाती है। फेफड़े वायु से भर जाते हैं। उच्छ्वसन के समय पसलियाँ नीचे और अंदर की ओर आ जाती हैं, जबकि डायाप्रफाम ऊपर की ओर अपनी पूर्व स्थिति में आ जाता है। इससे वक्ष-गुहा का आयतन कम हो जाता है। इस कारण वायु पेफपफड़ों से बाहर धवेफल दी जाती है।
  • फफेड़ा वक्षगुहा में पाया जाता है।
  • वक्षगुहा को आधार प्रदान करने के लिए एक पेशीय परत डायफ्राम होती है। इसी के कारण श्‍वसन के दौरान वक्षगुहा का आयतन बढ़ता-घटता है।
  • हमारे शरीर के रक्‍त में उपस्थित हीमोग्‍लोबीन फेफड़ा से ऑक्‍सीजन युक्‍त रक्‍त को शरीर के विभिन्‍न कोशिकाओं तक पहुँचाने का कार्य करता है। तथा कार्बन डाइऑक्‍साइड को शरीर के विभिन्‍न भागों के कोशिकाओं से फेफड़ा तक लाता है।

हम उच्छ्वसन में बाहर क्या निकालते हैं?

अन्य जंतुओं में श्वसन

  • तेलचट्टा (कॉकरोच) में 10 जोड़ी श्वास रंध्र होता है।
  • कॉकरोच के शरीर के पार्श्व भाग में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। जिसे श्वास रंध्र कहते हैं।
  • कॉकरोच (तेलचट्टा) तथा अन्‍य कीटों में श्‍वसन के लिए उनके शरीर पर छिद्र होते हैं जिसे श्‍वास रन्‍ध्र कहा जाता है। इसी श्‍वास रन्‍ध्र से श्‍वसन होता है।
  • तेलचट्टा का मुख्‍य श्‍वसन अंग श्‍वास रन्‍ध्र (ट्रैकिया) है।
  • कीटों में गैस के विनिमय के लिए वायु नलियों का जाल बिछा होता है, जो श्वासप्रणाल या वातक कहलाते हैं।
  • केंचुआ त्वचा से साँस लेता है। इसलिए केंचुआ का मुख्‍य श्‍वसन अंग त्‍वचा है।

जल में श्वसन

  • मछलियों में क्लोम या गिल पाए जाते हैं। क्लोम जल में घुली ऑक्सीजन का उपयोग कर श्वसन करते हैं। क्लोम त्वचा से बाहर की ओर निकले होते हैं।
  • क्लोम किस प्रकार श्वास में सहायता करते हैं? क्लोम में रक्त वाहिनियों की संख्या अधिक होती है, जो गैस विनियम में सहायता करती है।
  • मानव, पक्षीयों एवं जानवरों आदि का मुख्‍य श्‍वसन अंग फेफड़ा है।

क्या पादप भी श्वसन करते हैं?

  • पत्तियों में पाये जानेवाले छोट-छोटे छिद्र को रंध्र (स्‍टोमाटा) कहा जाता है।
  • पौधों में श्‍वसन (गैसों का आदान-प्रदान) रंध्रों द्वारा होता है।
  • हमें रात्री में पेड़ों के नीचे नहीं सोना चाहिए क्‍योंकि पेड़ रात्री में प्रकाश संश्‍लेषण नहीं होने के कारण कार्बन डाइऑक्‍साइड मुक्‍त करते हैं। जिस कारण पेड़ों के नीचे साँस लेने में कठीनाई होती है और गर्मी लगती है।

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